DP World ने बंदरगाहों के 30 साल के अनुबंध पर उठाए सवाल, संयुक्त उद्यम मॉडल की वकालत
डीपी वर्ल्ड समूह के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) युवराज नारायण ने भारत के बंदरगाह विकास मॉडल पर नए सिरे से विचार करने की बात कही है। उन्होंने दलील दी कि समय-सीमा से बंधे पारंपरिक अनुबंध दीर्घकालिक निवेश को हतोत्साहित करते हैं, जबकि सरकारों और निजी परिचालकों के बीच संयुक्त उद्यम बुनियादी ढांचे के अधिक टिकाऊ विकास को गति दे सकते हैं। नारायण ने कहा, ‘‘30 साल के अनुबंध का क्या मतलब है? जरा इसकी समय-सीमा को देखिए।’’ उन्होंने रेखांकित किया कि एक बंदरगाह के निर्माण और उसके परिचालन को स्थिर करने में ही कई साल लग जाते हैं। इसके बाद परिचालकों के पास अपने निवेश की भरपाई करने और सुविधाओं के आधुनिकीकरण के लिए बहुत कम समय बचता है। उन्होंने कहा, ‘‘संयुक्त उद्यम क्यों नहीं? सरकार एक भूस्वामी की भूमिका निभाए। आपके पास एक परिचालक हो, आप प्रमुख प्रदर्शन संकेतकों पर सहमति बनाएं। जब तक भरोसा न टूटे, यह साझेदारी हमेशा बनी रहनी चाहिए। इसमें क्या परेशानी है?’’ नारायण जिस मॉडल की वकालत कर रहे हैं, उसके तहत सरकार बंदरगाह के बुनियादी ढांचे का स्वामित्व अपने पास रखेगी और सहमत लक्ष्यों के आधार पर प्रदर्शन का मूल्यांकन करते हुए दीर्घकालिक संयुक्त उद्यमों के जरिये निजी परिचालकों के साथ साझेदारी करेगी। उन्होंने कहा कि इस तरह की व्यवस्था बार-बार निविदा जारी करने और अनुबंध नवीनीकरण की अनिश्चितता के बिना निजी परिचालकों को क्षमता विस्तार और प्रौद्योगिकी में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है। उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब डीपी वर्ल्ड भारत में अपनी उपस्थिति का विस्तार करने की तैयारी कर रही है। कंपनी ने अपने बंदरगाह, रेल और लॉजिस्टिक नेटवर्क को मजबूत करने के लिए देश में अतिरिक्त पांच अरब अमेरिकी डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता जताई है। कंपनी पिछले तीन दशक में भारत में पहले ही करीब तीन अरब डॉलर का निवेश कर चुकी है। दुबई स्थित डीपी वर्ल्ड के भारतीय परिचालन में 60 लाख टीईयू (बीस फुट समकक्ष इकाई) की कुल वार्षिक क्षमता वाले पांच कंटेनर टर्मिनल, भंडार गृह, फ्रेट फॉरवर्डिंग, कंटेनर फ्रेट स्टेशन, मुक्त व्यापार भंडारण क्षेत्र और अंतर्देशीय रेल टर्मिनल शामिल हैं।




